Bhojpuri Bhasha Ki Utpatti: Shuruaat Se Aaj Tak Ki Puri Kahani

भोजपुरी भाषा, जवना के नाम सुनते ही मन में एगो अपनापन और मिठास घुल जाला, आज उ खाली भारत के एगो क्षेत्रीय भाषा ना रह गइल बा। ई आज दुनिया के कोना-कोना में गूंजत बा। मॉरीशस से लेके सूरीनाम तक और गयाना से लेके फिजी तक, भोजपुरी आपन परचम लहरा रहल बिआ। लेकिन का रउआ जानत बानी कि एतनी मीठ भाषा के शुरुआत कहाँ से भइल? एकर जड़ कहाँ बा? आई आज ए लेख में विस्तार से जानल जाव।


भोजपुरी भाषा के नाम बिहार के आरा (भोजपुर) जिला के नाम पर पड़ल बा। कहल जाला कि उज्जैन के राजा भोज जब एह इलाका में आके बसले, त ऊ 'भोजपुर' शहर के स्थापना कइले। उहें के बोली और भाषा के आगे चल के 'भोजपुरी' कहल गइल।
भौगोलिक दृष्टि से देखल जाव त भोजपुरी मुख्य रूप से:
  • बिहार: आरा, बक्सर, छपरा, सिवान, गोपालगंज, रोहतास, भभुआ।
  • उत्तर प्रदेश: बनारस, गोरखपुर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, बस्ती।
  • झारखंड: पलामू, गढ़वा।
  • नेपाल: तराई के इलाका।

भाषाई जड़: मागधी अपभ्रंश से जुड़ाव

भाषा विज्ञान के नजरिया से देखल जाव त भोजपुरी के संबंध भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार से बा। एकर जननी संस्कृत मानल जाले, लेकिन एकर सीधा विकास मागधी प्राकृत और ओकरा बाद मागधी अपभ्रंश से भइल बा।

प्राचीन काल में मगध के आसपास के इलाका में मागधी प्राकृत बोलल जात रहे। ओही के एगो रूप 'पूर्वी अपभ्रंश' भइल, जवना से तीन गो मुख्य शाखा निकलली:
  1. मैथिली
  2. मगही
  3. भोजपुरी
भोजपुरी ए सभ में सबसे जादे फैलल और सबसे जादे लोगन के द्वारा बोलल जाए वाली भाषा बनल।

आदि काल: सिद्ध और नाथ साहित्य (8वीं - 12वीं सदी)

भोजपुरी के लिखित प्रमाण बहुत पुराना बा। बौद्ध सिद्धों के 'चर्यापद' में अइसन शब्द मिलेला जवन आजुओ भोजपुरी में ज्यों के त्यों प्रयोग होला। गोरखनाथ और नाथ सम्प्रदाय के जोगी लोग जब आपन उपदेश देत रहले, त ओकरा में भोजपुरी के तद्भव रूप साफ झलकत रहे।

"का आ तरुवर पंच बिडाल" - अइसन पंक्तियन में भोजपुरी के पुरान रूप देखल जा सकेला।

मध्य काल: कबीर और सूफी संत (14वीं - 18वीं सदी)

भोजपुरी के सबसे बड़ मजबूती मिलल संत कबीरदास के वाणी से। कबीर बनारस के रहले और उनकर 'सधुक्कड़ी' भाषा में भोजपुरी के पुट बहुत गहरा बा। कबीर के उलटबांसी और उनकर साखी आजुओ गांव-गांव में भोजपुरी के मिजाज में गावल जाला।

एही दौर में कई गो सूफी संत भी भइले जवन आपन प्रेम गाथा सुनावे खातिर लोकभाषा भोजपुरी के सहारा लिहलें। ए समय तक भोजपुरी एगो लोकभाषा के रूप में पूरी तरह स्थापित हो चुकल रहे।

19वीं सदी और 'भिखारी ठाकुर' के युग

भोजपुरी साहित्य और रंगमंच के इतिहास तब तक अधूरा बा जब तक भिखारी ठाकुर के नाम ना लिहल जाव। भिखारी ठाकुर के "भोजपुरी के शेक्सपियर" कहल जाला।

उ 'बिदेसिया' जैसन नाटक लिख के भोजपुरी समाज के ओ समय के सबसे बड़ समस्या—पलायन—के दुनिया के सामने रखले। उनकर नाटक देख के लोग रोवे लागत रहले। उ भोजपुरी के खाली मनोरंजन के साधन ना, बल्कि समाज सुधार के हथियार बनवले।

गिरमिटिया मजदूर और भोजपुरी के अंतरराष्ट्रीय उड़ान

भोजपुरी के इतिहास में एगो बहुत दुखद लेकिन महत्वपूर्ण मोड़ आइल जब अंग्रेज भारतीय लोगन के 'गिरमिटिया मजदूर' बना के विदेश ले गइले।

  • मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, गयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसन देशन में बिहार और यूपी के लोग गइले।
  • उ लोग अपने साथे 'रामायण' और 'भोजपुरी' के पोटली लेके गइले।
  • आज उलोग भले ऊहाँ के नागरिक बाड़े, लेकिन उनकर भाषा 'भोजपुरी' आजुओ ऊहाँ के संस्कृति के हिस्सा बा। मॉरीशस में त भोजपुरी के सरकारी मान्यता भी मिलल बा।

आधुनिक काल और भोजपुरी सिनेमा

20वीं सदी के उत्तरार्ध में भोजपुरी सिनेमा के शुरुआत भइल। 1963 में आइल पहिली फिल्म 'गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो' एगो मील के पत्थर साबित भइल। एकरा बाद 'लागी नहीं छूटे राम' और कई गो बेहतरीन फिल्म आइली।

सिनेमा के चलते भोजपुरी के पहचान पूरा भारत में फैलल। मनोज तिवारी, रवि किशन जैसन कलाकारन ने एकरा के घर-घर पहुंचा दिहल। हालांकि, हाल के समय में अश्लीलता के शिकायत भी आइल, लेकिन फिर भी भोजपुरी सिनेमा एगो बहुत बड़ इंडस्ट्री बन के उभरल बा।

भोजपुरी के लिपि: कैथी और देवनागरी

पुराना जमाना में भोजपुरी 'कैथी' लिपि में लिखल जात रहे। कायस्थ लोग सरकारी कामकाज में एकर प्रयोग करत रहले, एही से एकर नाम कैथी पड़ल। लेकिन धीरे-धीरे देवनागरी के प्रभाव बढ़ल और आज भोजपुरी मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में ही लिखल जाला।

आज के समय में भोजपुरी के चुनौती और भविष्य

आज भोजपुरी बोले वाला लोगन के संख्या 20 करोड़ से भी जादे बा। लेकिन अभी भी कुछ चुनौती बा:

  • संवैधानिक दर्जा: भोजपुरी के अभी तक भारतीय संविधान के 8वीं अनुसूची में शामिल ना कइल गइल बा। एकरा खातिर लड़ाई जारी बा।
  • अश्लीलता: कुछ गानों और फिल्मों के चलते भाषा के छवि खराब भइल बा, जवना के सुधारे के जरूरत बा।
  • शिक्षा: स्कूल और कॉलेज में भोजपुरी के पढ़ाई और बढ़ावा देवे के जरूरत बा।

भोजपुरी खाली शब्द के मेल ना ह, ई एगो संस्कार ह। ई ओ माटी के खुशबू बा जहाँ के लोग सतुआ खा के भी स्वाभिमान से जिएलें। कबीर के फकीरी से लेके भिखारी ठाकुर के बिदेसिया तक, और लोकगीत सोहर-चैता से लेके आज के आधुनिक गानों तक—भोजपुरी हर रूप में आपन जीवंतता बनाए रखले बा।

हमनी के जिम्मेदारी बा कि हमनी अपनी मातृभाषा के सम्मान करीं और एकरा के आगे बढ़ावे में योगदान दीं।

रउआ ई लेख कैसा लागल? अगर रउआ एह में कुछ और जानकारी जोड़वावल चाहत बानी या कवनो खास टॉपिक पर विस्तार चाहत बानी, त जरूर बताईं।

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